एक बाल्टी पानी, एक नवयुवक की प्रेरणा देने वाली कहानी

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    ये कहानी 23 साल के युवक सूरज और उसकी माँ की है लेकिन ये कहानी सिर्फ सूरज की ही नहीं बल्कि आज के है हर युवा की कहानी है जो बड़े होने पर अपने माँ-बाप के बारे में एक गलत धारणा बन लेते है।                                                                   

    सूरज एक कॉलेज से पोस्ट ग्रेजुएशन कर चुका है और प्रतियोगी परीक्षाओ की तैयारी कर रहा है। आज के हर युवा की तरह वो भी ऊँची मुकाम पर पहुंचना चाहता है। इसलिए वो अपने सपने को पूरा करने के लिए दिन-रात मेहनत करता है। आज के इस भाग-दौड़ भरे माहौल ने सूरज को चिड़चिड़ा सा बना दिया है लेकिन फिर भी वो अपनी परेशानिया किसी को भी नहीं बताता वो अपनी हर समस्या को खुद ही दूर करने की कोशिश करता है ताकि उसकी वजह से किसी को भी परेशानी ना हो। अपने इस चिड़चिड़े स्वभाव की वजह से वो दूसरो को डांट भी देता है और कभी-कभी तो वह अपने घर वालो से भी नाराज हो जाता है। उसको ये लगता है की उसके घर वाले उसकी बातो को नहीं समझते और उसकी बातो पर ज्यादा ध्यान भी नहीं देते है लेकिन एक दिन की घटना ने उसकी सारी ग़लतफ़हमी को दूर कर दिया –

    सूरज अपने माँ-बाप के साथ एक किराये के मकान में फर्स्ट फ्लोर पर रहता है। एक दिन की बात है की ऊपर की पानी की सप्लाई के लिए जो पानी की मोटर लगी थी वो ख़राब हो गयी अब पानी की समस्या हो गयी क्योंकि नीचे से बाल्टी भर-भर के पानी लाना कोई आसान काम नहीं होता है लेकिन अब इसके अलावा और कोई रास्ता भी नहीं था तो अब सूरज और उसकी माँ बाल्टी से पानी भरने लगे। सूरज के घर में एक बड़ी बाल्टी है जिसमे करीब 18 लीटर पानी आता है,सूरज ने सोचा की अगर बड़ी बाल्टी से पानी भरा जाए तो पानी जल्दी भर जायेगा लेकिन उस बाल्टी में पानी भर कर फर्स्ट फ्लोर तक ले जाना कोई आसान काम नहीं होता लेकिन फिर भी सूरज उस बाल्टी से पानी भरने लगा। सूरज की माँ ने जैसे ही देखा की सूरज बड़ी बाल्टी से पानी भर रहा है उन्होंने सूरज से तुरंत बाल्टी छीन ली और डाटते हुए कहा की अब दोबारा इस बाल्टी से पानी मत भरना अगर कही चोट लग गयी या फिर मोच आ गयी तो ? इतना कहते हुए उन्होंने बड़ी बाल्टी को अलग रख दिया।                                                                         

    अब सूरज के पास कोई शब्द नहीं थे ,क्योंकि उसे लगता था की उसके माँ-बाप उसकी परवाह नहीं करते है,उसके किसी भी काम पर उसके माँ-बाप ध्यान नहीं देते लेकिन आज की इस घटना ने उसको एक बात सिखा दी की बच्चे चाहे कितने ही बड़े क्योँ न हो जाये माँ-बाप हमेशा अपने बच्चो की परवाह करते है। लेकिन शायद बच्चे ही बड़े होने पर अपने माँ-बाप को भूल जाते है।

    ये कहानी मेरे अजीज मित्र नितेश कुमार ने लिखी है. मैं उनके कठिन परिश्रम की सराहना करता हूँ .

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