मजदूर दिवस विशेषः मजदूर चल दिया है, तुम्हारे शहरों को छोड़ अपने गांव की ओर मजदूर चल…

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आज मजदूर दिवस है. ये दिन मजदूरों के अधिकारों की आवाज उठाने के लिए होता है. इस सदी में शायद ये सबसे बुरे वक्त में पड़ा मजदूर दिवस है. देशभर के मजदूरों के लिए शायद इससे बुरा दिन क्या होगा कि न तो उनके हाथ में काम है और न ही खाने के लिए दो वक्त की रोटी. स्थिती ये है कि देश के तमाम बड़े शहरों से मजदूर पलायन करके वापस अपने गांव-घर जा रहा है.

कोई पैदल तो कोई साइकिल या रिक्शा से सैकड़ो किलोमीटर का सफर तय कर रहा है कितने तो ऐसे भी हैं जो निकले तो घर के लिए मगर वो रास्ते में ही काल के गाल में समा गए. लॉकडाउन के बाद से ऐसी न जाने कितनी कहानियां है जिन्हें सुनकर न तो हुक्मरान और न ही धन की लालसा रखने वालों को कोई फर्क पड़ता है. वो तो बस मस्त हैं अपनी ही धुन में, किसी को सत्ता का नशा चढ़ा है तो किसी को दौलत का.

देश में लॉकडाउन के 40 दिन बीतने को हैं मगर आज तक मजदूरों को वापस लाने या उन्हें सहायता देने को कोई फुल प्रूफ प्लान नहीं बन पाया. किसी राज्य ने पहल की भी तो कागजी कार्रवाई में ही हफ्तों लगा दिए जा रहे हैं. शायद हुकूमतों को ये नहीं पता कि जिसके पास खाने को कुछ न हो वो कितने दिन सब्र कर पाएगा. पता भी कैसे होगा वो आज भी छप्पन भोग उड़ा रहे हैं.

सत्ता में बैठे माननीय आज मजदूर दिवस की बधाई दे रहे हैं मगर 40 दिन में उन्हें उनके घर भेज पाने की व्यवस्था न कर पाना इस बात का सबूत है कि सत्ता से जुड़े लोगों के सरोकार मजदूरों से कितने दूर हैं. मजदूर चल दिया है शहरों की चकाचौंध को छोड़ अपने गांव की ओर, मजदूर पैदल ही चल दिया है.

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