मोहर्रम: कर्बला से हिंदुओं का भी है गहरा नाता, जानें कौन थे वो ब्राह्मण जो इमाम हुसैन के लिए लड़े थे

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इस्लामी नए साल का आगाज मोहर्रम के महीने से होता है. ये महीना बहुत ही शोक का महीना है. इस महीने में इस्लाम धर्म के आखिरी पैगंबर मुहम्मद साहब के नवासे इमाम हुसैन अपने 72 साथियों के साथ कर्बला के मैदान में तीन दिन के भूखे प्यासे शहीद कर दिए गए थे.

इमाम हुसैन का हिंदुस्तान से गहरा लगाव रहा है. कहा जाता है कि जब अखिरी वक्त यजीद ने उन्हें चारो ओर से घेर लिया था तो इमाम हुसैन ने कहा था कि मुझे हिंदुस्तान चले जाने की इजाजत दे दी जाए. मगर ऐसा हो न सका.

क्यों हुई थी कर्बला में जंग

कर्बला की जंग इतिहास की बहुत महत्वपूर्ण घटना है. ये जंग न तो हुकूमत के लिए थी और न ही वर्चस्व के लिए. ये जंग इसलिए थी कि बुराइयों और अच्छाइयों के बीच बटवारा कर दिया जाए. जब यजीद नाम के जालिम बादशाह की हुकूमत का दौर शुरू हुआ तो उसने इस्लाम धर्म में बुराइयों को शामिल करना शुरू कर दिया.

वो ये चाहता था कि शराब, जुआं और किसी भी महिला के साथ नाजाएज संबंध बनाने जैसे गलत कामों को सही ठहरा दिया जाए. इमाम हुसैन इस्लाम धर्म के संस्थापक मोहम्मद साहब के नवासे थे इसलिए उन्होंने यजीद की इस बात का विरोध कर दिया. यजीद ने उनके सामने शर्त रखी कि या तो वो उनकी बात मान लें नहीं तो मरने के लिए तैयार हो जाएं.

इमाम हुसैन ने ये साफ कर दिया कि चाहे तुम मुझे मार दो मगर मैं कभी गलत बात को सही नहीं कह सकता. इसी के बाद ईराक के कर्बला नामक स्थान पर जंग हुई और इमाम हुसैन को उनके साथियों के साथ शहीद कर दिया गया. शहीद होने वालों में 90 वर्ष के बुजुर्ग से लेकर 6 माह तक के बच्चे शामिल थे.

कौन थे वो हिंदू ब्राह्मण जो कर्बला में इमाम हुसैन का साथ देने गए थे

जब इमाम हुसैन को कर्बला में यजीद की फौज ने घेर लिया था तो उन्होंने हिंदुस्तान के एक हिंदू राजा को मदद के लिए खत लिखा था. कांधे पर जनेऊ, माथे पर तिलक लगाकर इंसानियत की मिसाल पेश करते हुए हिंदुस्तान से एक काफिला ईराक के कर्बला में इमाम हुसैन का साथ देने के लिए चल पड़ा था.

ये ख़त इमाम हुसैन ने अपने भाई जैसे दोस्त भारत के मोहयाल राजा राहिब सिद्ध दत्त नाम भेजा था. राहिब सिद्ध दत्त एक मोहयाल ब्राह्मण थे. इमाम हुसैन की ख़बर मिलते ही राहिब दत्त मोहयाल ब्राह्मणों की सेना के साथ कर्बला के लिए निकल पड़े. जब तक वो वहां पहुंचे तो इमाम हुसैन को शहीद किया जा चुका था.

ये जानकर राहिब दत्त का दिल टूट गया. जोश में तलवार को गले पर रख लिया. वो कहने लगे जिसकी जा’न बचाने आए थे वही नहीं बचा तो हम जीकर क्या करेंगे.

इमाम के चाहने वाले वीर योद्धा जनाबे अमीर मुख़्तार के मना करने पर राहिब ने तलवार को गर्दन से हटाया, और मुख़्तार के साथ मिलकर इमाम हुसैन के ख़ून का बदला लेने के मकसद से दुश्मनों से यादगार जं’ग करने निकल गए.

उस समय यज़ीद की फौज़ इमाम हुसैन के सिर को लेकर कूफा में इब्ने जियाद के महल ला रही थी. राहिब दत्त ने यजीद दस्ते का पीछा कर हुसैन का सिर छीना और दमिश्क की ओर कूच कर गए. रास्ते में एक पड़ाव पर रात बिताने के लिए रुके, जहां यजीद की फ़ौज ने उन्हें घेर लिया. हुसैन के सिर की मांग की.

राहिब दत्त ने दे दी अपने सात बेटों की कुर्बानी

राहिब दत्त ने इमाम का सिर बचाने के लिए अपने बेटे का सिर काट कर दे दिया.  जिस पर वो चिल्लाए, “ये इमाम हुसैन का सिर नहीं है”. हुसैन का सिर बचाने के लिए राहिब दत्त ने अपने सातों बेटों का सिर काट डाला लेकिन फौजियों ने उन्हें हुसैन का सिर मानने से इनकार कर दिया.

राहिब दत्त के दिल में इमाम हुसैन के क़’त्ल का बदला लेने की आ’ग भड़क रही थी. इसके लिए वो इमाम हुसैन के लिए लड़ रहे बाक़ी लोगों के साथ जंग-ए-मैदान में उतर आए. बहादुरी से लड़ते हुए चुन-चुन कर हुसैन के काति’लों से बदला लिया.

उन्हें हिंदुस्तानी तलवार के जौहर दिखाए. कूफे के सूबेदार इब्ने जियाद के किले पर कब्जा कर उसे गिरा दिया. जंग-ए-कर्बला में इन मोहयाली सैनिकों में कई वीरगति को प्राप्त हुए.

जंग खत्म होने के बाद कुछ मोहयाली सैनिक वहीं बस गए और बाक़ी अपने वतन हिंदुस्तान वापस लौट आए. इन वीर मोहयाली सैनिकों ने कर्बला में जहां पड़ाव डाला था उस जगह को ‘हिंदिया’ कहते हैं. इतिहास इन वीर मोहयाल ब्राह्मणों को ‘हुसैनी ब्राह्मण’ के नाम से जानता है.

इस कुर्बानी को याद रखने के लिए हुसैनी ब्राह्मण मोहर्रम के वक़्त अपने घरों में दर्जनों नौहे पढ़ते हैं. नौहा का मतलब है कर्बला की जंग में शहीद हुए लोगों को याद करना.

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