शाहीनबाग में चलता रहे लंगर इसलिए बेच दिया मकान, कहा वाहेगुरू ने जो दिया उसे सेवा में लगा दो

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Image credit- facebook @ds bindra

मानवता की सेवा करना ही सबसे बड़ा ध’र्म है. ये सीख हमें बचपन से ही दी जाने लगती है मगर बड़े होने के बाद अक्सर लोग इसे भूलकर अपनी जिंदगी में व्यस्त हो जाते हैं. मानवता की सेवा करने वाला व्यक्ति कभी किसी का ध’र्म नहीं देखता. निस्वार्थ भाव से इस तरह के काम करने वाले लोग इंसान के रूप में फरिश्ते के समान होते हैं. आज हम आपसे ऐसे ही एक फरिश्ते का जिक्र करने जा रहे हैं. इस फरिश्ते का नाम है डीएस बिंद्रा.

दिल्ली के रहने वाले डीएस बिंद्रा सिख समुदाय से ताल्लुक रखते हैं और पेशे से वकील हैं. वो दिल्ली हाईकोर्ट में वकालत करते हैं. डीएस बिंद्रा ने ऐसा कारनामा अंजाम दिया है कि इनकी चर्चा हर ओर हो रही है. उन्होंने अपना फ्लैट सिर्फ इसलिए बेच दिया कि शाहीनबाग में लंगर चलता रहे.

Image credit- facebook @ds bindra

बिंद्रा का कहना है कि गुरूद्वारा में लंगर चलाने से भी बेहतर ये है कि उन लोगों की सेवा की जाए जो संविधान की रक्षा के लिए त्याग कर रहे हैं. डीएस बिंद्रा ने बताया कि शुरूआत में उन्होंने खुरेजी और मुस्तफाबाद में लंगर चलाया मगर बाद में वो शाहीनबाग आ गए और वहां पर लंगर चलाने लगे. उन्होंने कहा कि हम शाहीनबाग में पूरी जिम्मेदारी के साथ काम कर रहे हैं.

उनका कहना है कि हम लंगर चलाने के लिए किसी से कैश नहीं ले रहे मगर फिर भी लोग सब्जी, तेल वगैरह देकर सहयोग कर रहे हैं. जब लंगर चलाने के लिए पैसे की कमी पड़ने लगी तो उन्होंने अपना मकान बेचने का फैसला किया. फ्लैट बेचने से पहले उन्होंने अपने बच्चों से राय मशविरा किया. सबकी सहमति के बाद उन्होंने अपना एक मकान बेच दिया और उस पैसे को लंगर चलाने के लिए लगा दिया.

Image credit- facebook @ds bindra

बिंद्रा का कहना है कि वाहेगुरू जी ने जो दिया है उसे मानवता की सेवा में लगाने में ही भला है. उनका कहना है कि वाहे गुरू का दिया रखने के लिए नहीं होता बल्कि सेवा करने के लिए होता है. बिंद्रा का कहना है कि अभी हमारे पास रहने के लिए एक मकान है इसलिए दूसरा मकान बेच दिया. बिंद्रा की एक बेटी एमिटी यूनिवर्सिटी से एमबीए कर रही है और बेटे की मोबाइल की दुकान है.

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