बाबरी मस्जिद तोड़ने वाला पहला कारसेवक बलवीर सिंह अब बनवा रहा 100 मस्जिदें, बताई ये वजह

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6 दिसंबर 1992 के दिन कारसेवा के जत्थे में शामिल होकर मैं अयोध्या में ही मौजूद था. वहां पर लाखों की संख्या में कारसेवक मौजूद थे. चारो ओर से एक ही आवाज आ रही थी कि एक धक्का और दो, ढांचे को तोड़ दो. सभी लोग विवादित ढांचे की तरफ तेजी से बढ़ रहे थे.

वहां मौजूद तमाम नेता अपने भाषण से भीड़ का उत्साह बढ़ रहे थे. पहले हम लोगों को लगा कि मस्जिद के आसपास काफी सुरक्षा व्यवस्था होगी मगर जैसे ही पास में पहुंचे तो हमारा उत्साह काफी बढ़ गया था. सबने एकसाथ मस्जिद को गिराने के लिए धावा बोल दिया. मस्जिद के गुंबद पर चढ़ने वाला मैं पहला शख्स था.

मैने गुंबद पर कुदाल से कई प्रहार किए. देखते ही देखते मस्जिद को ढहा दिया गया. जब मैं अपने शहर पानीपत लौटा तो मेरा स्वागत हीरो की तरह किया गया. लेकिन जब मैं अपने घर पहुंचा तो वहां का नजारा बदला हुआ था. मेरे घरवालों ने मेरी इस हरकत का खुला विरोध किया. घरवालों की नाराजगी ने मेरे मन को बदल कर रख दिया.

मैं एक राजपूत था, मुझे एहसास हो गया था कि मैने गलत काम किया है. मैने कानून को हाथ में लिया है. मुझे अपने किए पर पछतावा होने लगा. इस सब बातों से मैने अपने किए का प्रायश्चित करने की ठान ली. मैने इस्लाम धर्म कबूल कर लिया और अपना नाम बलवीर सिंह से बदलकर मोहम्मद आमिर रख लिया और एक महिला से निकाह कर लिया.

मेरे एक दोस्त और उस कारसेवा में शामिल योगेंद्र पाल ने भी प्रायश्चित करने के लिए इस्लाम कबूल कर लिया और अपना नाम मोहम्मद उमर रख लिया. इसके बाद हम दोनो ने ये तय कर लिया कि जबतक 100 मस्जिदें नहीं बनवा लेंगे तब तक खुद को माफ नहीं कर पाएंगे.

ये खुलासा बलवीर सिंह ने साल 2017 में मुबई मिरर से बात करते हुए किया. बलवीर ने बताया था कि अब तक वो 90 मस्जिदें बनवा चुका है और उसका काम जारी है. अब वो उन्ही मस्जिदों में इस्लाम की शिक्षा दे रहा है. बलवीर सिंह ने कहा कि मेरे पिता दौलत राम गांधीवादी विचारधार को मानते थे और पेशे से वो शिक्षक थे.

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